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    श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ पंचम दिवस ,महाजनो येन गत स पन्थाः- ईश्वर प्राप्ति का एक ही मार्ग

    We News 24 Hindi »सीतामढ़ी,बिहार
    कैमरामैन पवन साह के साथ ब्यूरो संवाददाता असफाक खान की रिपोर्ट 

    सीतामढ़ी: दिनांक 15 अक्टूबर से 21 अक्टूबर तक आयोजित 'श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ' के पंचम दिवस पर भगवान की अनंत लीलाओं में छिपे गूढ़ आध्यात्मिक रहस्य को कथा प्रसंगों के माध्यम से उजागर करते हुए दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान के संस्थापक एवं संचालक श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवताचार्या महामनस्विनी विदुषी सुश्री आस्था भारती जी ने महारास के खंड-विखंडित हुए रूप के प्रति लोगों को जागृत करने का प्रयास किया उन्होंने बताया कि जब संशयग्रस्त अक्रूर जी श्रीकृष्ण और बलराम जी के रथ पर बैठाकर मथुरा की ओर बढ़ रहे थे, तब मार्ग में वे नदी में स्नान करने के लिए रुके। उन्होंने नदी में स्नान करते हुए प्रभु की दिव्यता का दर्शन किया और मन में सभी संशयों से मुक्ति को प्राप्त किया।

    सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या भागवताचार्य साध्वी आस्था भारती जी ने समझाया कि लोग कहते हैं उन्हें नदी में ही श्रीकृष्ण व बलराम जी का दर्शन हो गया। परंतु ऐसा नहीं है। भागवत महापुराण समाधि की उत्कृष्टतम् अवस्था है मैं लिखा गया ग्रंथ है फिर एक साधारण मानव इन में छिपे गूढ़ अर्थ को अपने साधारण सी बुद्धि से कैसे समझ सकता है? वास्तविकता में अक्रूर जी ने ध्यान की नदी में उतरकर प्रभु का दर्शन किया था। आधुनिक समाज में भी ध्यान करना एक स्टेटस सिंबल बन गया है। ऑब्जेक्टिव मेडिटेशन, ट्रांसकेंडेंटल मेडिटेशन, डांसिंग मेडिटेशन आदि। कोई बल्ब पर दृष्टि एकाग्र करने को ध्यान कहता है, तो कोई मोमबत्ती पर। कोई मन को कल्पना के द्वारा किसी सुंदर स्थान पर ले जाने को ध्यान की प्रक्रिया समझ रहा है, तो कोई बाहरी मित्रों को मूंद कर बैठ जाने को ध्यान कहता है। श्री आशुतोष महाराज जी कहते हैं कि उपास्य के बिना उपासना कैसी ? साध्य के है बिना साधना कैसी? 

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    ध्यान दो शब्दों का जोड़ है-ध्येय+ध्याता=ध्यान।
    ध्याता हम हैं जो ध्यान करना चाहते हैं लेकिन हमारे पास ध्येय नहीं है जो स्वयं ईश्वर है।
     एक्चुअली मेडिटेशन इज द डाइरेक्ट कॉन्फ्रेंस वीद गॉड. इसलिए सबसे पहले ध्येय की प्राप्ति करनी होगी। उस (ईश्वर )ध्येय को प्राप्त करने का केवल एक ही माध्यम है।
    जिसके बारे में यक्ष ने युधिष्ठिर से प्रश्न किया- कः पंथाः? 
    युधिष्ठिर ने कहा- तर्कोप्रतिष्ठः श्रुतियोंविभिन्नाः नेकोऋषिर्यस्य वचः प्रमाणम्
    धर्मस्य तत्वं निहितं गुहायां महाजनो येन गतः स पंथाः।।


     अर्थात महापुरुषों के द्वारा बताए गए मार्ग पर चलना होगा यानि उस ध्येय की प्राप्ति के लिए हमें भी किसी ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की शरण में जाना होगा।
     कथा के अंतिम क्षणों में कथा व्यास जी ने कहा 'अंधकार को क्यों धिक्कारें, अच्छा हो एक दीप जलाएं।' अंधकार कितना ही पुराना क्यों न हो लेकिन एक छोटा सा दीपक जलाते ही वह क्षण भर में खत्म हो जाता है। इसी प्रकार कोई कितना भी पापी क्यों न हो, ज्ञान का दीपक जलते ही जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का तिमिर छंट जाता है। अंगुलिमाल दस्यु,गणिका वेश्या, सज्जन ठग सदृश्य अनेकों उदाहरण इतिहास हमारे समक्ष रखता है। 

    परिवर्तन की इसी कहानी को सर्व श्री आशुतोष महाराज जी ने वर्तमान में भी जीवंत कर दिखाया है। श्री गुरुदेव का कहना है कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं। भारत की जेलों में कार्यरत 'बंदी सुधार एवं पुनर्वास कार्यक्रम- अंतरक्रांति' प्रकल्प इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। वे कैदी जिनके मुख अपशब्दों के अंगारे उगलते थे, आज शांत भाव से प्रभु के भजन गुनगुना रहे हैं। अब उनके हाथ में जुर्म की कालिख से नहीं, बल्कि स्व-रोजगार एवं स्वावलंबन की महक से सुगंधित हैं।

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    आज के मुख्य अतिथि- माननीय सांसद सुनील कुमार पिंटू
    श्री दिनकर पंडित, पूर्व प्रमुख, डूमरा
    श्री अशोक कुमार सिंह
    श्री संजय सिंह
    श्री मणिभूषण शरण,सीतामढ़ी।
    डॉ.जे.के.सिंह, होस्पीटल, सीतामढ़ी
    श्री सिकंदर राय, वरिष्ठ समाजसेवी।
    डॉ.शंकर कुमार, बैरगनिया आदि ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

    देवेन्द्र कुमार द्वारा किया गया पोस्ट 

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