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    स्कूल और नगर निगम द्वारा जारी आयु प्रमाण पत्र के आगे मान्य नहीं होगा हड्डियों की जांच का प्रमाण पत्र ,दिल्ली हाई कोर्ट

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    NCR/दिल्ली/ब्यूरो संवाददाता योगेन्द्र साह    
     

    नई दिल्ली : नाबालिग के उम्र निर्धारण के संबंध में दिल्ली हाई कोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली याचिका पर स्पष्ट किया कि स्कूल और नगर निगम द्वारा जारी आयु प्रमाण पत्र मौजूद होने की स्थिति में हड्डियों की जांच का प्रमाण पत्र मान्य नहीं होगा। यौन अपराधों से बच्चों को संरक्षण देने संबंधी अधिनियम (पॉक्सो) के तहत दर्ज एक मामले में हड्डियों के प्रमाण पत्र के आधार पर पीड़िता को बालिग मानकर आरोपितों को आरोप मुक्त करने के निचली अदालत के फैसले को रद कर दिया। न्यायमूर्ति मनोज कुमार ओहरी की पीठ ने कहा कि स्कूल से जारी आयु प्रमाण पत्र की प्रमाणिकता पर कोई संदेश नहीं है। पीठ ने अभियोजन पक्ष की पुनर्विचार याचिका को स्वीकार करते हुए निचली अदालत के फैसले को रद कर दिया।

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    पीठ ने कहा कि 15 जनवरी 2016 को लागू किए गए जुवेनाइल जस्टिस एक्ट-2015 की धारा-94 के तहत नाबालिग की उम्र तय करने के तीन प्रावधान हैं। इसके तहत सबसे पहला प्रमाण स्कूल या फिर दसवीं कक्षा का प्रमाण पत्र और दूसरा नगर निगम और पंचायत द्वारा जारी किया गया जन्म प्रमाण पत्र होगा। इन दोनों की अनुपलब्धता में हड्डियों की जांच का प्रमाण पत्र मान्य होगा। पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने पीड़िता का शहादरा स्थित नगर निगम प्रतिभा स्कूल का आयु प्रमाण पत्र पेश किया। इसमें यह साबित हुआ कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।

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    क्या है मामला
    याचिका के अनुसार, 25 मार्च 2016 को पीड़िता की मां की शिकायत पर करावल नगर थाना पुलिस ने पीड़िता को आरोपित तेजवीर के घर से बरामद किया था। पुलिस ने तेजवीर, उसकी पत्नी और सह-आरोपित सतेंद्र के खिलाफ पॉक्सो समेत अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज की। पीड़िता ने तेजवीर के नाबालिग बेटे से शादी की थी और दोनों उसके साथ रह रहे थे। आरोप पत्र के साथ स्कूल प्रमाण पत्र पेश किया गया। प्रमाण पत्र के हिसाब से घटना के दौरान पीड़िता की उम्र 12 साल की थी। इसके बाद भी जांच अधिकारी ने पीड़िता की हड्डियों की जांच कराई थी। इसमें पीड़िता की उम्र 16 से 18 बताई गई थी। इसी के आधार पर आरोपितों को आरोप मुक्त कर दिया था।

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