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    VIDEO: सीतामढ़ी,दानवीर भामाशाह की 473 वीं जयंती पर ,जरुरतमंदों के बिच 100 किचन किट का वितरण किया गया

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    We News 24 Hindi »बिहार/राज्य
    सीतामढ़ी /रोहित ठाकुर के साथ संजू गुप्ता  की रिपोर्ट

    सीतामढ़ी: महान राष्ट्रभक्त दानवीर भामा शाह की 473 वीं जयंती तैलिक वैश्य संघ के तत्वावधान में  वैश्विक महामारी कोरोना के संक्रमण के वजह हुए लोकडाउन घड़ी में गरीब यतीम को खाने की दिक्कत हो रही है.इसी को देखते हुए | सोशल डिस्टेंसिंग का पूरी तरह पालन करते हुए कपरौल रोड सीतामढ़ी स्थित। डॉ प्रतिभाआनंद के आवास पर 100 किचन किट का वितरण किया गया।

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     इस कार्यक्रम में। जिला अध्यक्ष विनोद प्रसाद महामंत्री चितरंजन प्रसाद कोषाध्यक्ष मणि शंकर प्रसाद सांसद प्रतिनिधि अभिषेक कुमार गुड्डू डॉ प्रतिभा आनंद सहित सीतामढ़ी लोकसभा क्षेत्र के सांसद सुनील कुमार पिंटू। भी उपस्थित थे।

    वि  न्यूज़ 24 ने। स्थानीय सांसद सुनील कुमार पिंटू से कोरोना महामारी। जैसे विकट स्थिति। लॉक डाउन से हो रहे  आम लोगों की कठिनाइयां। साथ में। बहुत ऐसे परिवार हैं जिनके पास राशन कार्ड नहीं है। राशन कार्ड है तो ₹1000 नहीं आ रहा है। इन सब पर प्रकाश डालने को कहा तो सुनिए सीतामढ़ी के। स्थानीय सांसदसुनील कुमार पिंटू ने इस बारे में क्या कहा |



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    सांसद सुनील कुमार पिंटू ने कहा कि दानवीर भामाशाह ने राष्ट्र की बलिवेदी पर अपना सर्वस्व न्योछावर कर राष्ट्रीय स्वाभिमान को अक्षुण्ण रखने का अप्रतिम उदाहरण प्रस्तुत किया था। आज सम्पूर्ण देश और दुनिया कोरोना के खिलाफ लङाई लङ रहा है। लॉकडाउन में कई परिवारों के समक्ष आर्थिक संकट है। कई लोग अपने घर परिवारों से दूर फंसे हैं। ऐसी स्थिति में भामाशाह से प्रेरणा लेकर गरीबों की सेवा में आगे बढ कर पीङित मानवता की सेवा करना ही दानवीर भामाशाह के जयंती समारोह की सार्थकता होगी।




    भामा शाह कौन थे 

    भामा शाह महाराणा प्रताप के बचपन के मित्र थे | इनका जन्म 1547 ई. में ओसवाल परिवार में भारमल के यहां हुआ | ये व्यापारी थे | मेवाड़ के राजकोष का उत्तरदायित्व इन्होंने व इनके पुरखों ने कुछ पीढियों से सम्भाला |1576 ई. में इन्होंने व इनके भाई ताराचंद ने हल्दीघाटी युद्ध में भाग लिया था | 1578 ई. में जब महाराणा प्रताप व मेवाड़ की आर्थिक स्थिति डगमगा गई, तब चूलिया गांव में महाराणा प्रताप की भेंट भामाशाह कावडिया व इनके भाई ताराचन्द कावडिया से हुई
    25 लाख का धन व 20 हजार अशर्फियां महाराणा प्रताप को भेंट कर भामाशाह व ताराचन्द ने अपना नाम इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हुआ | उनके बारे में एक दोहा है जो इस प्रकार है 

    "भामो परधानो करै, रामो कीधो रद्द |
    धरची बाहर करणनूं, मिलियो आय मरद्द ||"

    (ये दोहा उसी जमाने का है व इसमें भामाशाह को 'मर्द' कहा गया है जो कि उनकी मालवा लूटने की बहादुरी की तरफ संकेत करता है)

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