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    व्यंग : गरीब हटाओ आंदोलन के नेता जी ने मुझे बुलाया




    We News 24 Hindi »नई दिल्ली 

    लेखक विष्णु भट्ट 


    संतुलित आदर्शवाद:देश में लॉक डाउन धीरे -धीरे खुलने लगा। अभी लॉक डाउन खुलने का दूसरा चरण चल रहा है। भले ही लॉक डाउन में छूट मिल रही हो लेकिन स्कूल और कॉलेज अभी खुले नहीं हैं। इसलिए घर पर खाली बैठा था।  तभी ध्यान आया कि एक दिन गरीब हटाओ आंदोलन के नेता जी ने मुझे बुलाया था। फोन मिलाया तो कहा कि आ जाओ बैठकर बात कर लेते हैं। 


    मैं मुँह पर मास्क लगाए, जेब में सेनेटाइजर लिए पूरी सावधानी के साथ नेता जी के घर पहुँचा। सामान्य बातचीत के बाद मैंने उनसे एक सवाल पूछा," सर, आप लोग इतने सालों से गरीबी हटाने के लिए रात- दिन एक किए हुए हैं? फिर भी गरीबी कम नहीं हो रही, कारण क्या है?"
    "गरीब कम नहीं हुई ऐसा नहीं है। गरीबी तो काफ़ी कम हुई है लेकिन जिस अनुपात में कम हुई है उससे ज़्यादा ग़रीब पैदा हो रहे हैं।समस्या की जड़ यह है।" उन्होंने समझाया।

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    "एक कड़वा सच जो समाज में अक्सर चर्चा का विषय है ,अगर बुरा न माने तो पूछने की अनुमति चाहता हूँ?"
    " अब आपसे क्या पर्दादारी बिंदास पूछिए।"
    " जो भी नेता ग़रीबी हटाने के लिए आंदोलन चलाते हैं, वे औरों की ग़रीबी हटा पाएँ या न हटा पाएँ पर अपनी ग़रीबी तो हटा ही लेते हैं? कैसे?
    "यही तो ग़लतफ़हमी है लोगों में?देखिए मैं गाँधी जी के सिद्धान्त में विश्वास रखनेवाला हूँ। गाँधी जी ने क्या कहा है कि जो कुछ भी परिवर्तन समाज में लाना चाहो उस पर पहले ख़ुद आचरण करो। कहा है कि नहीं, बताइए?"


    " बिलकुल कहा है।"
    " फिर बताइए कि औरों की ग़रीबी हटाने से पहले ख़ुद की ग़रीबी हटाई। अब औरों की हटाने के लिए प्रयत्नशील हैं। गाँधी जी के सिद्धांत का पालन करना हमारा कर्तव्य है। "
    उन्होंने जीभ को दाँतों से दबाया और कानों को हाथ लगाया।
    " सिद्धांत की बात तो ठीक है पर आप लोगों पर जनता कैसे भरोसा करेगी?"
    " आप भी कमाल करते हैं। अगर लोग भरोसा नहीं करते तो हम यहाँ होते? देखिए मैं समझता हूँ। जब हमने अपना भला किया तो लोगों को भरोसा हुआ कि जो अपना भला कर सकता है वह एक दिन हमारा भी भला अवश्य करेगा। बस इसी आशा पर वे हमें सपोर्ट करते हैं और आप तो जानते ही हैं कि आशा पर ही दुनिया टिकी है। जिस दिन आशा समाप्त हो जाएगी उस दिन दुनिया ही नहीं रहेगी।"

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    " आप जिस सेवा के रास्ते पर चल रहे हैं, उसे कितना कठिन मानते हैं?"
    " देखिए सेवा का रास्ता त्याग का रास्ता है। इतिहास उठाकर देख लीजिए देश सेवा के लिए महाराणा प्रताप ने जंगलों में रहकर घास की रोटियाँ खाई थीं। वे मेरे ऐतिहासिक आदर्श पुरुष हैं। जनता की भलाई के लिए राजसी सुख का त्याग कर दिया? आधुनिक काल में मेरे आदर्श  लालू जी हैं। बिहार की जनता के हित के लिए उन्होंने पशुओं का चारा तक खाया पर सेवा से पीछे नहीं हटे। जनता की भलाई के लिए जेल चले गए पर झुके नहीं।"


    " सर, कहाँ महाराणा प्रताप और कहाँ लालू यादव? दोनों की तुलना मुझे ठीक नहीं लगी?"
    " आप लोग भी कमाल के हैं। किसी बात पर विचार किए बिना ही 'रिएक्ट' करने लगते हैं। सुनिए मैं समझता हूँ। हाथी देखा है न। उसके दो दाँत बाहर होते है और बाकी भीतर। तो समझिए मेरे लिए बाहर के दाँत महाराणा प्रताप हैं और भीतर के लालू यादव। जो नेता आदर्शवाद में इस तरह का संतुलन साधना नहीं जानता वह जनता का सफल मार्गदर्शन नहीं कर सकता? इसलिए बैलेंस बनाकर चलना पड़ता है।"


    "और कोई आदर्श हैं आपकी नजर में? "
    " बिलकुल हैं। त्याग और सेवा की सीख जहाँ से भी मिले लेनी ही चाहिए। बात पड़ोसी देश नेपाल की है।  आपको याद होगा ? दो साल पहले वहाँ भयानक भूकंप आया था। कई गाँव तबाह- बरबाद हो गए थे।  दुनियाभर से लोग सेवा के लिए आगे आए। अरबों की सहायता राशि मदद के लिए दी गई। यहाँ तक कि लोगों ने तिरपाल भी दान दी। अरबों की धनराशि से उतनी समस्या पैदा नही जितनी समस्या तिरपाल के खड़ी कर दी? पैसा तो नेताओं ने रखा या जनता को दिया पता ही नहीं ? पर तिरपाल तो सबको दिखती है न? अब एक विकट समस्या सामने आई कि जिनके पास ख़ुद रहने के लिए घर नहीं रहे वे तिरपाल कहाँ रखेंगे।




     खुले में रखने से उसके फट जाने या भीग कर गल जाने का खतरा था। इस समस्या की ख़बर जब नेताओं को लगी तो उनकी आत्मा तड़प उठी। सेवा भावना हृदय को फाड़कर बाहर निकल आई और गरीबों की समस्या का समाधान तुरन्त कर डाला। सभी नेताओं ने तिरपाल आपस में बाँट ली और जनता की सारी चिंता तिरपाल में लपेटकर अपने घर ले गए। बुद्ध की भूमि में जन्मे ये दयालु जनता की परेशानी अपने सिर लेने के अलावा और क्या कर सकते थे?  

    उनकी सेवा भावना और त्याग देखकर मेरा सिर उस दिन जो झुका था वह आज तक उठ नहीं पाया। मेरी तो प्रभु से प्रार्थना है कि वह गरीबों की ऐसी सेवा करने के मौके हमें भी देता रहे।"
    " मैं चाहता हूँ कि आप मेरा भी मार्गदर्शन करें।"
    " मित्र होने के नाते मैं आपसे सत्य कहूँगा, मानना न मानना आपकी मर्ज़ी है? सेवा का मार्ग त्याग और धैर्य का मार्ग है। आप लोग छोटी-छोटी बातों में बिदकने लगते हैं यह ठीक नहीं है। समय की  गति पहचानना सीखिए तभी समाज का भला कर सकते हैं।"
    नेता जी का उपदेश सुनकर लगा कि मेरा तो दुनिया में जन्म लेना ही व्यर्थ हो गया? आत्महत्या करने की सोच रहा था कि नेता जी की बात याद आई, उतावलापन ठीक नहीं होता।"

    विष्णु भट्ट 

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