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    भारत के इस राज्य में शादी के बाद पुरुष की होती है विदाई ,महिलाओं का होता घर पर राज



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    We News 24 Hindi » नई दिल्ली

    दीपक कुमार 

    नई दिल्ली : भारत शुरू से पुरुष प्रधान देश रहा है और यहां पर प्राचीन काल से शादी के बाद दुल्हनों की विदाई की प्रथा चली आ रही है, लेकिन भारत में कई धर्म, जाति और समुदाय के लोग रहते हैं, जिनके रीति रिवाज अलग अलग होते हैं, लेकिन एक समानता सभी धर्म के लोगों में देखने को मिलती है और वो दुल्हन की विदाई है. सभी धर्मों में शादी के बाद दुल्हन की विदाई की जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं हमारे देश में एक ऐसी जनजाति भी है जहां दुल्हन नहीं बल्कि दूल्हे की विदाई होती है ? शादी होने के बाद दुल्हन , दूल्हे के घर नहीं जाती बल्कि दूल्हा, दुल्हन के घर पर आकर रहता है.जी हां हम बात कर रहे हैं, मेघालय की खासी जनजाति  मातृसत्तात्मक समाज की .  

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    वंशीय परंपरा माता के नाम पर चलती  है

    इस जनजाति में वंशीय परंपरा माता के नाम पर चलती  है. इस समुदाय में माता-पिता की संपत्ति पर पहला अधिकार महिलाओं का होता है. लड़का और लड़की को विवाह हेतु अपना जीवन साथी चुनने की पूरी आजादी दी जाती है. खासी समुदाय में किसी भी प्रकार के दहेज की व्यवस्था नहीं है, जो कि एक खास बात है इस समुदाय की. महिलाएं अपनी इच्छा पर किसी भी वक्त अपनी शादी को तोड़ सकती हैं. परिवार की सबसे छोटी बेटी पर सबसे अधिक जिम्मेदारी होती है. वही घर की संपत्ति की मालिक होती है.

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    इनकी आबादी असम, मणिपुर और पश्चिम बंगाल में

    खासी लोगों की संख्या तकरीबन 9 लाख के करीब है. इनकी ज्यादातर आबादी मेघालय में रहती है. इनकी आबादी का कुछ हिस्सा असम, मणिपुर और पश्चिम बंगाल में रहता है. यह समुदाय झूम खेती करके अपनी आजीविका चलाता है. संगीत के साथ इसका एक गहरा जुड़ाव है. ये विभिन्न तरह के वाद्य यंत्रों जैसे गिटार, बांसूरी, ड्रम आदी को गाते बजाते हैं.

    दो अन्य जातियों में भी होती है दूल्हे की विदाई

    खासी जनजाति के अलावा मेघालय में दो और जनजातियां पाई जाती हैं, जहां पर दूल्हे की विदाई की प्रथा है, वो गारो और जयंतिया जाति हैं. यहां पर भी शादी के बाद दूल्हा अपनी पत्नी के घर पर जाकर रहता है. इसकी खास बात ये हैं कि यहां बेटी होने पर खूब खुशियां मनाई जाती हैं.


    पहले म्यंमार में रहते थे

    ये लोग पहले म्यंमार में रहते थे. इसके बाद इस जनजाति ने वहां से अप्रवास किया और भारत के पूर्वी असम में आकर रहने लगे. इसके बाद धीरे-धीरे इनकी आबादी मेघालय में आकर बसने लगी. इस जनजाति की भाषा खासी है. खासी जनजाती के अलावा मेघालय की अन्य दो जनजातियों (गारो और जयंतिया) में भी यही प्रथा है. इन दोनों जनजातियों में यही व्यवस्थाएं चलती है. यहां पर भी शादी के बाद दूल्हा, अपनी सासू मां के घर पर जाकर रहता है. अमूमन भारत में यह देखा जाता है कि लड़का होने पर ज्यादा खुशी मनाई जाती है. वहीं खासी जनजाति में लड़की होने पर खुशी मनाई जाती है. 



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