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    नेताओं की भी छात्रों की तरह साल में एक बार परीक्षा होनी चाहिए ?




    We News 24 Hindi »नई दिल्ली 

    एडिटर एंड चीफ दीपक कुमार 

    नई दिल्ली : चुनावों को लोकतंत्र का पर्व कहा जाता है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के बिहार राज्यों में इन दिनों इसी पर्व माहोल बन रहा है यानी पूरे ज़ोर शोर से सभी राजनितिक  पार्टी  बिहार विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए गए . लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि क्या  सही में  चुनाव के बाद लोकतंत्र आता है? 

    क्या आपको ये लगता है कि आपके शहर, राज्य या देश में जनता का शासन है? आप हमेशा ये सुनते होंगे और कहते होंगे कि आपके राज्य में बीजेपी की सरकार है, कांग्रेस की सरकार है, या किसी और राजनीतिक पार्टी की सरकार है. लेकिन आपके मन में ये बात नहीं आती होगी कि ये आपकी सरकार है.
     


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    क्या आपको कभी ये लगा कि चुनावों में आपसे वोट मांगने वाले तमाम नेता आपके लिए काम करते हैं ? ज़ाहिर है आपको ऐसा महसूस नहीं होता होगा. क्योंकि हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का अधिकार सिर्फ पांच साल में एक बार वोट देकर अपना प्रतिनिधि चुनने तक सीमित है. अगर नेता ने आपसे एक बार वोट ले लिया तो फिर वो आपको 5 साल के लिए भूल जाता है और अपनी मनमानी करता रहता है और उसको 5 साल पहले उसके कुर्सी से हटा भी नहीं सकते चुनाव के वक्त वो आपके आगे हाथ जोड़कर वोट मांगता चुनाव के बाद वो आपका त्रिस्कार करता है  .

    साथ में अकड़ भी दीखता अगर इसे दुसरे भाषा में कहे तो वो आपका मालिक समझने लगता है कुछ सवाल पूछियेगा तोकहेगा नेतागीरी मत करो. हमें नेता चुनने से पहले हमें लोकतंत्र की परिभाषा को याद करना होगा.




    आपने नागरिक शास्त्र या राजनीति शास्त्र की किताबों में लोकतंत्र की.. कई तरह की परिभाषाएं पढ़ी होंगी. लोकतंत्र का अर्थ है जनता का शासन. अमेरिका, दुनिया का पहला लोकतंत्र था इसलिए पूरी दुनिया में अमेरिका के 16वें राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन द्वारा दी गई लोकतंत्र की परिभाषा सबसे ज्यादा प्रचलित है. उन्होंने कहा था कि Democracy is Government of the people, by the people, for the people यानी लोकतंत्र वो शासन व्यवस्था है जिसमें जनता का शासन हो, जो जनता के लिए हो और जनता द्वारा हो.


    लेकिन क्या वाकई ऐसा होता है? ये सारी बातें किताबों में बहुत अच्छी लगती हैं. लेकिन असल ज़िंदगी में इन्हें किसी ने गंभीरता से लिया ही नहीं विडंबना ये है कि अगर अपना नेता चुनते हुए आपसे कोई गलती हो जाए तो उसे हटाने के लिए भी आपको अगले 5 साल तक इंतज़ार करना पड़ेगा. फिर चाहे इन 5 वर्षों में आपका विधायक या सांसद आपके इलाके में झांकने के लिए भी न आए. आप उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते.



    भारत के स्वतंत्रता संग्राम की नींव रखने वाले बाल गंगाधर तिलक ने 'स्वराज' को जन्मसिद्ध अधिकार कहा था . इस नारे में एक संकल्प है... शक्ति है, स्वाभिमान की भावना है और अपने अधिकारों को लेकर एक जागरूकता है . लेकिन आज़ादी से कई वर्ष पहले दिया गया बाल गंगाधर तिलक का ये नारा सिर्फ एक नारा बनकर रह गया है.
    जन्मसिद्ध अधिकार का मतलब है.. वो अधिकार जो किसी को जन्म लेते ही मिल जाता है. 1947 के बाद पैदा हुए भारतवासियों को स्वतंत्रता का अधिकार तो मिल गया, लेकिन क्या वो वाकई स्वतंत्र हैं. उन्हें अपनी सरकार को चुनने का अधिकार भी मिला, लेकिन क्या सही मायने में उनकी अपनी सरकारें हैं? क्या सही मायने में जनता को पूर्ण स्वराज मिला है?

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    इन नेताओं को ये हिम्मत इसलिए मिलती है क्योंकि हमारे देश में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है कि अगर विधायक या सांसद काम न करें तो उन्हें हटा दिया जाए. हमें लगता है कि हमारे देश में एक ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे जनता खुद बार बार, विधायक या सांसद के कामकाज का आंकलन कर सके. क्योंकि राज्य कोई भी हो, नेताओं से लोगों की ये शिकायत रहती है कि एक बार विधायक या सांसद बनने के बाद वो दोबारा सिर्फ चुनाव के समय ही आते हैं. 

    आज हम देश के सामने एक विचार रखना चाहते हैं. और वो विचार ये है कि जिस तरह हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था में विद्यार्थियों के लिए परीक्षा का आयोजन होता है. उसी तरह नेताओं के लिए भी परीक्षा होनी चाहिए. और ये काम वार्षिक जनमत संग्रह की मदद से किया जा सकता है. 




    विधायक या सांसद का कार्यकाल 5 साल का होता है. इस हिसाब से अगर पूरे कार्यकाल की परीक्षा का Weightage 100% है... तो एक साल में 20% के Weightage के हिसाब से परीक्षा होनी चाहिए.
    इस परीक्षा के तहत ये देखा जाना चाहिए कि विधायक या सांसद ने अपने इलाके के लोगों से जो वादे किए थे, वो पूरे हुए कि नहीं? 


    और अगर कोई नेता जनता की नज़र में फेल हो जाता है, तो उसे फिर से टिकट नहीं मिले . और जनता के हाथ में अपने नाकाबिल विधायक या सांसद को हटाने की शक्ति भी होनी चाहिए. ये भी जनमत संग्रह की मदद से तय किया जा सकता है. इस परीक्षा में फेल होने वाले नेताओं से उनकी सरकारी सुविधाएं छीन ली जानी चाहिएं और उनकी पेंशन भी बंद हो जानी चाहिए. वैसे अगर ये परीक्षा प्रणाली लागू हो गई तो हमारे देश के ज्यादातर नेता फेल हो जाएंगे. 



    क्योंकि इन नेताओं को जनता की याद सिर्फ चुनाव के वक्त ही आती है. और चुनाव के दौरान वो हर तरह के हथकंडों का इस्तेमाल करते हैं. वोट हासिल करने के लिए नेता कुछ भी कर सकते हैं. हो सकता है कि सामान्य दिनों में अगर आप अपने जन प्रतिनिधियों से मिलने की कोशिश करें, तो वो आपको मिलने का वक्त ही न दें. लेकिन चुनाव का समय ऐसा होता है, जब जन प्रतिनिधि खुद चलकर आपके दरवाज़े तक आते हैं.

    आप इन्हें कुछ भी बोलें, वोट हासिल करने के लिए ये सब कुछ सहते हैं. और आपके वोट पाने के लिए कोई भी काम करते हैं. और फिर वोट मिलते ही 5 साल के लिए अदृश्य हो जाते हैं. ये रिपोर्ट देखिए और ये विचार कीजिए कि क्या सही मायने में यही लोकतंत्र है ? क्या इसे स्वराज कहा जा सकता है ? अभी आपने हमारे देश के सभ्य नेताओं की असभ्यता देखी. लेकिन अब आपको ये बताते हैं, कि नेताओं का स्वभाव और उनके काम करने का तरीका कैसा होना चाहिए.
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