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    चलो हमारे साथ 21 किलोमीटर लंबी गोवर्धन परिक्रमा पर,जाने इसका महत्त्व ,देखे वीडियो

     

    तस्वीर @We News 24

    We News 24 Hindi »मथुरा /उत्तर प्रदेश 
    एडिटर एंड चीफ दीपक कुमार  की  रिपोर्ट

    मथुरा :गोवर्धन परिक्रमा का हिन्दू धर्म में बड़ा ही महत्त्व है। हिन्दुओं का प्रसिद्ध तीर्थस्थल गोवर्धन, मथुरा से 26 कि.मी. पश्चिम में डीग हाईवे पर स्थित है। कहा जाता है कि यहाँ के कण-कण में भगवान श्रीकृष्ण का वास है। यहाँ एक प्रसिद्ध पर्वत है, जिसे 'गोवर्धन पर्वत' अथवा 'गिरिराज' कहा जाता है। इस पर्वत की लंबाई 8 कि.मी. है। हिन्दू धर्म में मान्यता है कि इसकी परिक्रमा करने से मांगी गई सभी मुरादें पूरी हो जाती हैं। लोग लोट-लोट कर यानि दंडवत परि‍क्रमा भी पूरी करते हैं। पूरी साल  सैकड़ों श्रद्धालु  गोवर्धन आते हैं और 21 कि‍लोमीटर के परिक्रमा लगाते हैं।  श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। लोग सर्दी, गर्मी और बरसात की परवाह कि‍ए बि‍ना ही 365 दि‍न यहाँ श्रद्धा-सुमन अर्पि‍त करते हैं।

    पौराणिक कथा

    भगवान कृष्ण के पिता नंद महाराज ने एक बार अपने भाई उपनंद से पूछा कि- "गोवर्धन पर्वत वृंदावन की पवित्र धरती पर कैसे आया?" तब उपनंद ने कहा कि- "पांडवों के पिता पांडु ने भी यही प्रश्न अपने दादा भीष्म पितामह से पूछा था। इस प्रश्न के उत्तर में भीष्म पितामह ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-


    एक दिन गोलोक वृंदावन में भगवान श्रीकृष्ण ने राधारानी से कहा कि- "जब हम ब्रजभूमि पर जन्म लेंगे, तब हम वहां पर अनेक लीलायें रचायेंगे। तब हमारे द्वारा रचाई गई लीला धरतीवासियों की स्मृतियों में हमेशा रहेगी। पर समय परिवर्तन के साथ यह सब चीजें ऐसी नहीं रह पायेंगी और नष्ट हो जायेंगी। परन्तु गोवर्धन पर्वत और यमुना नदी धरती के अन्त तक रहेंगी। यह सब कथा सुनकर राधारानी प्रसन्न हो गईं।


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    प्रमुख दर्शनीय स्थल

    साक्षी गोपाल जी कान वाले बाबा मंदिर

    यहाँ आने वाले लोग गोवर्धन पर्वत पर बने गिरिराज मंदिर में पूजा करते हैं। इसके बाद परिक्रमा के लिए चल देते हैं। गोवर्धन पर्वत से यात्रा शुरू करने के बाद पहला मंदिर यही आता है। यहाँ पर साक्षी गोपाल जी की मूर्ति है। लोग यहाँ पर भगवान को नमन कर आगे बढ़ते हैं।


    श्री राधा-गोविंद मंदिर

    इस मंदिर का निर्माण भगवान श्रीकृष्ण के पोते वज्रनाभ ने करवाया था। यह मंदिर प्राचीन काल का बताया जाता है। यहाँ पर एक भव्य गोविंद कुंड भी है। पौराणिक कथाओं के अनुसार गिरिराज गोवर्धन की पूजा से इन्द्र ने कुपित होकर ऐसी भीषण वर्षा की, जिससे ब्रज डूबने लगा और तब बालकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठाकर डूबते ब्रज को बचाया था। पराजित होकर इंद्र श्रीकृष्ण की शरण में आए और कामधेनु के दूध से उनका अभिषेक किया। गौ के बिन्दू् अर्थात् गौ दुग्ध से वह स्थल एक कुंड के रूप में बदल गया जो कि गोविंद कुंड के नाम से प्रसिद्ध हुआ। यहाँ आज भी गौ खुर, बंशी आदि चिन्हों से अंकित गिरिशिलाएं हैं।



    राजस्थान की सीमा

    गोवर्धन पर्वत की लंबाई करीब 08 किलोमीटर से ज्याादा है। इसका आधा हिस्सा‍ उत्तर प्रदेश में आता है तो दूसरा हिस्सा राजस्थान में। दुर्गा माता मंदिर से आगे राजस्थास की सीमा शुरू हो जाती है। इस मंदिर की देवी को 'बॉर्डर वाली माता' भी कहा जाता है। परिक्रमा मार्ग पर यहाँ एक विशाल गेट बना हुआ है।


    पूंछरी का लौठा मंदिर और छतरी


    परिक्रमा मार्ग पर 'पूंछरी लौठा' नामक जगह पर बेहद पुराना भवन है, इसे 'छतरी' कहते है। कहा जाता है कि यहाँ पर संत, साधु रहकर श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत का भजन करते हैं। यहाँ साधुओं का आना-जाना लगा रहता है। इसी जगह के पास एक मंदिर भी है।


    हरजी कुंड

    परिक्रमा मार्ग पर हरजी कुंड है। इस कुंड के संचालन समिति के अध्यक्ष के अनुसार हरजी श्रीकृष्ण के सखा थे। वह कृष्ण के साथ गाय चराने जाया करते थे। यहाँ पर दोनों की लीलाएं हुई थीं। इसी वजह से इस कुंड का बहुत महत्व है। वर्तमान में इस कुंड का पानी गंदा और मटमैला हो गया है।


    रुद्र कुंड

    यहाँ पर विशाल रुद्र कुंड है, जहां श्रीकृष्ण की लीला हो चुकी है। बाद में यहाँ पर अवैध कब्जा हो गया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर अवैध कब्जा हटा दिया गया। इसके बाद इस कुंड का निर्माण फिर से किया गया है।


    राधाकृष्ण मंदिर और कलाधारी आश्रम

    यहाँ राधा-कृष्ण का मंदिर है। इस मंदिर में परंपरा के तहत आश्रम संत सेवा काफ़ी सालों से चल रहा है। करीब 70 साल पहले इसकी स्थापना हुई थी। हर दिन यहाँ पर 40 से 50 संत आते-जाते रहते हैं। यहाँ पर सौ गायें पाली गई हैं। हमेशा से यह आश्रम संतों की सेवा में लगा है।


    ठाकुर बिहारीजी महाराज मंदिर

    इस मंदिर के महंत सुखदेव दास हरी वंशी के अनुसार यह मंदिर बेहद पुराना है, लेकिन इसके स्थापना काल के बारे में कुछ पता नहीं है। इसे मैथिल ब्राह्मण समाज के लोग चलाते हैं।


    श्री लक्ष्मी वेंकटेश मंदिर, गऊघाट

    इस मंदिर की स्थापना वर्ष 1963 में दक्षिण भारतीय परंपरा से हुई थी। यह मानसी गंगा के बीच में स्थित है। इस मंदिर की पूजा की परंपरा दक्षिण भारतीय है।


    चूतड़ टेका मंदिर

    यह बेहद पुराना मंदिर है, जिसे अब नया रूप दे दिया गया है। इसमें हनुमान, राम, लक्ष्मण, सीता और राधा-कृष्ण की प्रतिमाएं हैं। बताया जाता है कि जब श्रीराम को लंका जाने के समय समुद्र पर पुल की आवश्यकता हुई तो पत्थर मंगवाए गए। उस वक्त हनुमान द्रोणगिरी पर्वत के पास गए। तब द्रोणगिरी ने अपने बेटे गिरिराज (गोवर्धन पर्वत) को इस कार्य के लिए भेजा। हनुमान गोवर्धन को लेकर समुद्र किनारे जा रहे थे, तभी आदेश हुआ कि अब सेतु निर्माण हेतु पत्थरों की आवश्यकता नहीं है। इस बीच हनुमान ने गोवर्धन पर्वत को यहीं पर रख दिया। वे यहाँ बैठे भी थे। इसलिए इस जगह का नाम चूतड़ टेका हो गया। दूसरी कथा के अनुसार भयंकर बारिश के दौरान ब्रज को बचाने के लिए श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को उठा लिया था। इसके बाद श्रीकृष्ण ने लोगों के साथ पर्वत की परिक्रमा की। इस दौरान श्रीकृष्ण यहीं पर बैठे थे। तब से इस जगह को चूतड़ टेका भी कहते हैं।


    हनुमान का पंचमुखी रूप

    मंदिर के साथ-साथ यहाँ पर आश्रम भी बना हुआ है और अखंड 'रामायण' का पाठ चलता रहता है। मान्यता के अनुससार यह मंदिर 25 वर्ष पहले बनाया गया था।


    केदारनाथ धाम माता वैष्णो देवी मंदिर

    इस मंदिर का निर्माण केदारनाथ नामक व्यक्ति ने करवाया था। 50 साल पहले गौ सेवा और धर्मार्थ के लिए इस मंदिर की स्थापना की गई थी।


    उद्धव कुण्ड, गोवर्धन

    जब श्रीकृष्ण मथुरा से द्वारिका चले गए थे, तब उन्होंने उद्धव को मथुरा में गोपियों का हाल जानने के लिए भेजा था। बताया जाता है कि यहाँ पर उद्धव जी महाराज कुंड में विराजमान हैं।


    विट्ठल नामदेव धाम

    परिक्रमा मार्ग पर विट्ठल नामदेव मंदिर है। भक्त यहाँ पर आकर भगवान को नमन करते हैं और फिर आगे बढ़ते हैं।

    राधा कुण्ड, गोवर्धन

    इस कुंड को राधा ने अपने कंगन से खोदकर बनाया था। मान्यता है कि राधाकुंड और श्यामकुंड में नहाने से गौ हत्या का पाप खत्म हो जाता है। यहाँ के पुजारियों के अनुसार, जब श्रीकृष्ण की हत्या करने की कंस की सारी योजना विफल होती जा रही थी, तब असुर अरिष्टासुर को भेजा गया। उस समय कृष्ण गायों को चराने के लिए गोवर्धन पर्वत पर गए हुए थे। यहाँ पहुंचने के बाद अरिष्टासुर ने बैल का रूप धारण किया और गायों के साथ चलने लगा। इसी दौरान श्रीकृष्ण ने उसको पहचान लिया और उसका वध कर दिया। इसके बाद वह राधा के पास गए और उन्हें छू लिया। इस बात से राधारानी बेहद नाराज़ हुईं। उन्होंने कहा कि गौ हत्या करने के बाद छूकर मुझे भी पाप का भागीदार बना दिया। इस घटना के बाद राधारानी ने कंगन से खोदकर कुंड की स्थापना की। उन्होंने मानसी गंगा से पानी लेकर इसे भरा। इसके बाद सभी तीर्थों को कुंड में आने की अनुमति

    श्या‍म कुंड

    श्रीकृष्ण ने गौ हत्या का पाप खत्म करने के लिए छड़ी से कुंड बनाया। उन्होंने सभी तीर्थ को उसमें विराजमान किया और इसमें स्नान भी किया। यहाँ कार्तिक महीने की कृष्णाष्टमी के दिन स्नान करने का अलग महत्व है


    कुसुम सरोवर, गोवर्धन

    यहाँ पर कुसुम वन है। श्रीकृष्ण द्वारा राधा जी की वेणी गूंथी जाने के स्थल के रूप में यह प्रसिद्ध है। यह सरोवर प्राचीन है। पहले यह कच्चाक कुंड था। इसे ओरछा के नरेश राजा वीरसिंह जूदेव ने वर्ष 1819 में पक्का करवाया था। इसके बाद वर्ष 1723 में भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने इसे कलात्मक स्वरूप प्रदान किया। उनके पुत्र महाराजा जवाहर सिंह ने वर्ष 1767 में यहाँ पर कई छतरियों का निर्माण करवाया था।

    श्याम कुटी

    यह स्थल प्राचीन काल का है। यहाँ पर श्रीकृष्ण ने लीलाएं की थीं। वर्तमान में यहाँ का नजारा उजड़ा-सा लगता है। अब यहाँ पर वृक्षारोपण और सौंदर्यीकरण का काम भी करवाया गया है।

    मानसी गंगा मंदिर


    मानसी गंगा, गोवर्धन

    इस मंदिर में मानसी गंगा की प्रतिमा है और श्रीकृष्ण के स्वरूपों की भी पूजा होती है। मान्यता है कि जब गोवर्धन पर्वत का अभिषेक हो रहा था, उस वक्त गंगा के लिए पानी की आवश्यककता हुई। तब सभी चिंता में पड़ गए कि इतना गंगाजल कैसे लाया जाए। इस दौरान भगवान ने अपने मन से गंगा को गोवर्धन पर्वत पर उतार दिया। इसके बाद से ही इसे मानसी गंगा कहते हैं। पहले यह छह किलोमीटर लंबी गंगा हुआ करती थी, लेकिन अब यह सिमट कर कुछ ही दूर में रह गई है।


    मंदिर गिरिराज जी

    यहाँ पर गिरिराज (गोवर्धन पर्वत) का मंदिर है। इसमें निरंतर पूजा चलती रहती है। मंदिर के अंदर एक विशाल कुंड बना हुआ है, जिसमें गोवर्धन पर्वत का स्वरूप रखा हुआ है।


    परिक्रमा समाप्त

    इस स्थान पर आकर भक्तों की परिक्रमा समाप्त होती है। यहाँ पर एक विशाल गेट बना हुआ है। परिक्रमा पूरी कर लोग खुद को धन्य मानते हैं।


    कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को गोवर्धन (गिरीराज भगवान) पूजा की जाती है। इस वर्ष गोवर्धन का त्योहार 15 नवंबर को मनाया जाएगा। कथाओं के अनुसार गोवर्धन पूजा द्वापर युग से चली आ रही है। कृष्ण जी ने ब्रजवासियों की रक्षा करने के लिए 7 दिनों तक अपनी उंगली पर गोवर्धन पर्वत को उठा कर रखा था। गोवर्धन पूजा के दिन गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाकर पूजन किया जाताहै। इस दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा का विशेष महत्व माना जाता है। गोवर्धन भगवान और कृष्ण जी की विशेष कृपा पाने के लिए लोग इस दिन गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हैं। लोग गोवर्धन की परिक्रमा के समय कुछ गलतियां कर देते हैं, जिससे उन्हें पूरी कृपा नहीं मिल पाती है। परिक्रमा करते समय की गई कुछ गलतियों के कारण लोग पाप के भागीदार भी बनते हैं, इसलिए गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करते हुए नियमों का पालन करना बहुत आवश्यक माना गया है। जानते हैं।



     

    गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा से जुड़े नियम 

    परिक्रमा प्रारंभ करने से पहले गोवर्धन पर्वत को प्रणाम करें और ध्यान रखें कि किस स्थान से आपने परिक्रमा आरंभ की है। गोवर्धन की परिक्रमा जिस स्थान से आरंभ करते हैं, उसी स्थान पर समाप्त करते हैं।  

    अगर आपको गोवर्धन परिक्रमा आरंभ करनी है तो पहले मानसी गंगा में स्नान अवश्य कर लेना चाहिए। अगर गंगा में स्नान करना संभव न हो तो हाथ मुंह धोकर भी परिक्रमा आरंभ की जा सकती है। 

    अगर आप गोवर्धन की परिक्रमा करते हैं तो उसे पूरा अवश्य करें। परिक्रमा को बीच में कभी अधूरा छोड़ने की गलती न करें। अगर किसी विशेष कारण से आपको परिक्रमा अधूरी छोड़नी पड़े तो गोवर्धन भगवान और कृष्ण जी से क्षमा प्रार्थना करने के पश्चात ही परिक्रमा छोड़े।




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