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    सीतामढ़ी भूमि अधिग्रहण से पहले तय हो मुआवजा,किसानों के समर्थन में कोईली पहुंचे युवा कांग्रेस अध्यक्ष







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    सीतामढ़ी से असफाक खान की रिपोर्ट
    • भूमि अधिग्रहण से पहले तय हो मुआवजा
    • किसानों के समर्थन में कोईली पहुंचे युवा कांग्रेस अध्यक्ष
    • सड़क निर्माण में बिना सहमति भू-अर्जन का है मामला
    • किसानों के साथ अन्याय बर्दाश्त नहीं : शम्स शाहनवाज़



    सीतामढ़ी : भूमि बैंक बढ़ाने की हड़बड़ी में राज्य भूमि अधिग्रहण में उचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 (संक्षेप में भूमि अधिग्रहण कानून, 2013) को कमजोर कर रहे हैं। यह कानून सही दिशा में उठाया गया कदम माना गया था, लेकिन पांच साल बाद भी विरोध प्रदर्शन और न्यायालय में बढ़ते मुकदमों से यह साबित होता है कि अधिग्रहण प्रक्रिया सही रास्ते पर नहीं है। 

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    इसी तरह का एक मामला सीतामढ़ी जिले के  बथनाहा प्रखंड के कोइली गाँव से आया है | जंहा बिहार सरकार द्वारा  बिना किसानो की सहमति खेति की ज़मीन अधिग्रहण किया गया जिसका किसान  विरोध कर रहे है इसी मामले की लेकर  बुधवार सीतामढ़ी जिला युवा कांग्रेस अध्यक्ष मो.शम्स शाहनवाज़  शम्स ने किसानों का दुःख-दर्द सुनने के लिए पहुचे और उन्हें न्याय एवं समुचित मुआवजा दिलाने का आश्वासन भी दिया।

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    दरअसल, कोईली ग्राम के वार्ड नंबर 11 में इनदिनों सड़क का निर्माण कार्य चल रहा है। ग्रामीण किसानों का आरोप है कि उनसे बिना सहमति लिए उनकी खेतिहर ज़मीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। किसान जयंत कुमार सिंह, गजेंद्र सिंह, रामाश्रे साह, जगदीश सिंह, राम प्रकाश आदि ने कहा कि हम लोग सड़क निर्माण के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि भूमि अधिग्रहण की जो प्रक्रिया अपनाई जा रही है वो संदेहास्पद है। हम लोगों को जिला भू-अर्जन पदाधिकारी की ओर से न तो कोई नोटिस मिला है और न ही मुआवजा की राशि की कोई जानकारी दी गई है। ऐसे में भूमि अधिग्रहण करना कहां तक उचित है?

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    युवा कांग्रेस जिलाध्यक्ष मो.शम्स शाहनवाज़ ने कहा कि किसानों की आपत्ति और आशंकाओं का समाधान किया जाना चाहिए। बिना नोटिस, सहमति-पत्र और मुआवजा पर चर्चा के बगैर किसानों की जमीन के अधिग्रहण की कोशिश किसानों के अधिकारों का अतिक्रमण है, जिसे युवा कांग्रेस बर्दाश्त नहीं करेगा। युवा कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल जिला पदाधिकारी से मिलकर किसानों को न्याय एवं मुआवजा दिलाने के लिए भू-अर्जन पदाधिकारी की अध्यक्षता में कोईली गांव में ही स्पेशल कैम्प लगाने की मांग करेगा, ताकि सड़क के निर्माण के साथ किसानों को समुचित मुआवजा मिल सके।

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    मौके पर जिला कांग्रेस के पूर्व उपाध्यक्ष वीरेन्द्र कुशवाहा, युवा कांग्रेस के सोशल मीडिया कोऑर्डिनेटर अफ़रोज़ आलम, सिकंदर कुशवाहा, विवेकानंद यादव, कपिलेश्वर सिंह, देवेंद्र शर्मा, शिवनाथ सिंह, राम ईश्वर सिंह, रामजीवन सिंह, दिनेश सिंह, कपल मुखिया, राजू सिंह, सुधीर सिंह, वीणा देवी, पंकज सिंह, मुन्ना सिंह आदि मौजूद थे।


    50 किसानों के करीब दो एकड़  भूमि का होना है अधिग्रहण
    कोईली ग्राम में निर्माणाधीन सड़क के लिए 50 किसानों की करीब 2 एकड़ भूमि का अधिग्रहण किया जाना है। इनमें से अधिकांश भूमि खेती की है। जिसके मुआवजा को लेकर संशय को देखते हुए किसानों ने दो दिन पूर्व सड़क निर्माण का कार्य रोक दिया था।


    आइये जानते है कानून और विधेयक का कुछ अंश 

    भूमि अधिग्रहण कानून पांच महत्वपूर्ण स्तंभों पर टिका है। ये स्तंभ हैं सामाजिक प्रभाव आकलन (एसआईए), लोगों की सहमति, मुआवजा, पुनर्वास एवं पुनर्स्थापन। यह कानून सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए निजी जमीन लेने की सरकारी शक्तियों को सीमित करता है। वहीं अनावश्यक सार्वजनिक इस्तेमाल के लिए सरकार द्वारा भेदभावपूर्ण अधिग्रहण भी रोकता है।

     कानून पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण से प्रभावित 70 प्रतिशत लोगों की स्वीकृति अनिवार्य बनाकर लोगों की व्यापक भागीदारी सुनिश्चित करता है। प्राइवेट परियोजनाओं के लिए 80 प्रतिशत लोगों की स्वीकृति जरूरी है। कानून के अनुसार, ग्रामीण भूमि का मुआवजा बाजार मूल्य का चार गुणा होगा, जबकि शहरी भूमि के लिए बाजार मूल्य का दोगुना मुआवजा मिलेगा। रोजगार गंवाने और जमीन देने वाले लोगों का पुनर्वास और पुनर्स्थापन भी अनिवार्य है।


    सरकार 1894 के पुराने कानून में किसी भी सरकारी उद्देश्य के लिए अर्जेंसी क्लॉज का इस्तेमाल कर भूमि अधिग्रहित कर लेती थी। नए कानून में इसे सीमित कर दिया गया है। सरकार अब केवल राष्ट्रीय सुरक्षा, प्राकृतिक आपदा या संसद द्वारा मान्य अन्य किसी आपात स्थिति में ही अर्जेंसी क्लॉज के माध्यम से जमीन ले सकती है। 

    इन श्रेणियों के तहत ली जाने वाली जमीन के लिए लोगों की स्वीकृति और एसआईए जरूरी नहीं है। अगर पांचवी या छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों में इस तरह का अधिग्रहण होता है तो ग्रामसभा अथवा स्वायत्त परिषद की स्वीकृति जरूरी है। नया कानून कई फसलों वाली सिंचित जमीन का अधिग्रहण भी रोकता है। विशेष परिस्थितियों में जमीन लेने पर सरकार को उतनी ही जमीन विकसित करके देनी होगी।

    इस तरह कानून सरकार से शक्तियां लेकर भूमि मालिकों को सौंपता है। यही वजह है कि राज्यों ने इस कानून के तोड़ के रूप में एक आसान रास्ता खोज लिया है। 1 जनवरी 2014 को इस कानून के लागू होने के बाद ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार ने अध्यादेश लाकर इस कानून को कमजोर करने की कोशिश की। इसके पीछे दलील थी कि नया कानून जटिल, समय लेने वाला और लागत बढ़ाने वाला है।

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